मलिक मुहम्मद जायसी
जीवन परिचय
- जन्म: 15वीं शताब्दी के उत्तरार्ध (अनुमानतः 1492 ई.) में हुआ।
- निधन: अनुमानतः 1548 ई. में।
- निवास स्थान: जायस, कब्र अमेठी, उत्तर प्रदेश।
- पिता का नाम: मलिक शेख ममरेज (मलिक राजे अशरफ)।
- गुरु: सूफी संत शेख मोहिदी और सैयद अशरफ जहाँगीर।
- व्यक्तित्व: चेचक के कारण रूपहीन तथा बाईं आँख और कान से वंचित थे। स्वभाव से मृदुभाषी, मनस्वी और संत थे।
साहित्यिक कृतियाँ एवं विशेषताएँ
- प्रमुख रचनाएँ: पद्मावत, अखरावट, आखिरी कलाम, चित्ररेखा, कहरनामा (महरी बाईसी), मसला या मसलानामा।
- अन्य उल्लेखनीय कृतियाँ: चंपावत, होलीनामा, इतरावत।
- काव्य भाषा: जायसी की भाषा अवधी (किसानों और कारीगरों की भाषा) है।
- काव्य शैली: उन्होंने कड़बक शैली (चौपाई-दोहा आदि) का प्रयोग किया है।
- विशेषण: जायसी को 'प्रेम की पीर' का कवि कहा जाता है।
प्रमुख महाकाव्य: 'पद्मावत'
- आधार: 'पद्मावत' जायसी की उज्ज्वल कीर्ति का मुख्य आधार है।
- कथानक: इसमें चित्तौड़ नरेश रतनसेन और सिंहल द्वीप की राजकुमारी पद्मावती की प्रेमकथा है।
- त्रिकोणीय संघर्ष: इस कहानी में दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के जुड़ने से प्रेम त्रिकोण पूरा होता है।
- स्वरूप: यह कथा ऐतिहासिक आधार, जनश्रुतियों और कवि की सृजनात्मक कल्पना का मिश्रण है।
साहित्यिक परंपरा
- प्रेमाख्यानक काव्य: लोकजीवन की प्रेम कथाओं को आधार बनाकर लिखे गए इन काव्यों को हिंदी में 'प्रेमाख्यानक काव्य' कहा जाता है।
- सूफी मत: जायसी ने जन-प्रचलित प्रेम कहानियों को सूफी प्रेम साधना के साथ जोड़कर काव्य का रूप दिया।
- महत्व: आचार्य रामचंद्र शुक्ल और डॉ. माताप्रसाद गुप्त जैसे विद्वानों ने उनकी रचनाओं का संपादन 'जायसी ग्रंथावली' के नाम से किया है।
कड़बक (1): आत्म-गुण और प्राकृतिक उपमाएँ
इस अंश में जायसी अपनी एक आँख और रूपहीनता के बावजूद अपने गुणों की श्रेष्ठता बताते हैं।
एक नैन कबि मुहम्मद गुनी। सोइ बिमोहा जेइँ कबि सुनी।
अर्थ: कवि मुहम्मद (जायसी) के पास केवल एक ही आँख है, फिर भी वे अत्यंत गुणवान हैं। जिस किसी ने भी उनके काव्य को सुना, वह उनके प्रति मोहित हो गया।
चाँद जइस जग बिधि औतारा। दीन्ह कलंक कीन्ह उजिआरा।
अर्थ: विधाता (ईश्वर) ने उन्हें इस संसार में चंद्रमा के समान पैदा किया है। जैसे चंद्रमा में दाग (कलंक) है पर वह पूरे संसार को अपनी चांदनी से आलोकित करता है, वैसे ही जायसी भी शारीरिक दोष के बावजूद अपने ज्ञान से प्रकाश फैला रहे हैं।
जग सूझा एकइ नैनाहाँ। उवा सूक अस नखतन्ह माहाँ।
अर्थ: उन्होंने एक ही आँख से पूरे संसार को समझ लिया है। उनकी वह एक आँख नक्षत्रों के बीच उदित होने वाले 'शुक्र तारे' (Venus) के समान तेजस्वी है।
जौ लहि अंबहि डाभ न होई। तौ लहि सुगंध बसाइ न सोई।
अर्थ: जब तक आम (अंबहि) में मंजरी (डाभ/नकीली शाखा) नहीं निकलती, तब तक उसमें वह विशिष्ट सुगंध नहीं आती। (अर्थात् दोष या कष्ट के बिना श्रेष्ठता नहीं आती)।
कीन्ह समुद्र पानि जौं खारा। तौ अति भयउ असूझ अपारा।
अर्थ: समुद्र का पानी खारा है (दोष है), इसी कारण वह इतना विशाल, अगम्य और अपार है।
जौ सुमेरु तिरसूल बिनासा। भा कंचनगिरि लाग अकासा।
अर्थ: जब शिव के त्रिशूल ने सुमेरु पर्वत का विनाश (स्पर्श) किया, तभी वह सोने का होकर आकाश तक ऊँचा उठ सका।
जौ लहि घरी कलंक न परा। काँच होइ नहिं कंचन करा।
अर्थ: जब तक सोने को तपाने वाले पात्र (घरी) में कच्चा सोना नहीं तपता, तब तक वह निखरकर पक्का सोना (कंचन) नहीं बनता।
एक नैन जस दरपन औ तेहि निरमल भाउ। सब रूपवंत गहि मुख जोवहिं कइ चाउ।।
अर्थ: कवि की एक आँख दर्पण के समान स्वच्छ और निर्मल भाव वाली है। इसी कारण बड़े-बड़े रूपवान लोग भी उनके चरणों को पकड़कर बड़े चाव (उत्साह) से उनके मुख की ओर देखते हैं और उनका सम्मान करते हैं।
कड़बक (2): काव्य की अमरता और स्मृति
इस अंश में जायसी बताते हैं कि मनुष्य मर जाता है, लेकिन उसकी कीर्ति (यश) अमर रहती है।
मुहमद यहि कबि जोरि सुनावा। सुना जो पेम पीर गा पावा।
अर्थ: मुहम्मद जायसी कहते हैं कि मैंने इस काव्य को जोड़कर (रचकर) सुनाया है। जिसने भी इसे सुना, उसे प्रेम की पीड़ा (अनुभव) का अहसास हुआ।
जोरी लाइ रकत कै लेई। गाढ़ी प्रीति नैन जल भेई।
अर्थ: मैंने इस कथा को अपने रक्त की लेई (गोंद) लगाकर जोड़ा है और अपनी गाढ़ी प्रीति को आँखों के आंसुओं से भिगोया है।
औ मन जानि कबित अस कीन्हा। मकु यह रहै जगत महँ चीन्हा।
अर्थ: मैंने मन में यह विचार करके इस कविता की रचना की है कि शायद मेरे जाने के बाद इस संसार में मेरी यही एक निशानी (चिह्न) रह जाए।
कहाँ सो रतनसेनि अस राजा। कहाँ सुवा असि बुधि उपराजा।
अर्थ: अब न तो वे राजा रत्नसेन रहे और न ही वह बुद्धिमान 'सुवा' (तोता) रहा जिसने राजा को राह दिखाई थी।
कहाँ अलाउद्दीन सुलतानू। कहँ राघौ जेइँ कीन्ह बखानू।
अर्थ: न वह सुल्तान अलाउद्दीन रहा और न वह राघव चेतन रहा जिसने पद्मावती के रूप का बखान किया था।
कहँ सुरूप पदुमावति रानी। कोइ न रहा जग रही कहानी।
अर्थ: न वह सुंदर रानी पद्मावती रही। अब कोई भी जीवित नहीं है, बस संसार में उनकी कहानी शेष रह गई है।
धनि सो पुरूख जस कीरति जासू। फूल मरै पै मरै न बासू।
अर्थ: वह मनुष्य धन्य है जिसकी कीर्ति (यश) इस संसार में कायम है। जैसे फूल झड़कर मर जाता है, लेकिन उसकी सुगंध (बासू) हमेशा बनी रहती है, वैसे ही कीर्ति भी अमर रहती है।
केइँ न जगत जस बेंचा केइँ न लीन्ह जस मोल। जो यह पढ़ै कहानी हम सँवरै दुइ बोल।।
अर्थ: इस संसार में यश को न तो कोई बेच सका है और न ही कोई इसे खरीद सका है। जो भी व्यक्ति इस कहानी को पढ़ेगा, वह हमें (कवि को) दो शब्दों में याद जरूर करेगा।
कड़बक के साथ (मुख्य प्रश्नोत्तर)
1. कवि ने अपनी एक आँख की तुलना दर्पण से क्यों की है?
उत्तर: दर्पण स्वच्छ और निर्मल होता है; वह जैसा होता है, वैसा ही प्रतिबिम्ब दिखाता है। कवि जायसी की एक ही आँख है, लेकिन उनकी अंतरात्मा दर्पण की तरह स्वच्छ और निर्मल भाव वाली है। जिस प्रकार दर्पण में चेहरा साफ दिखता है, उसी प्रकार कवि की कविता में सत्य और निर्मलता झलकती है, जिससे प्रभावित होकर बड़े-बड़े रूपवान लोग भी उनका सम्मान करते हैं।
2. पहले कड़बक में कलंक, काँच और कंचन से क्या तात्पर्य है?
उत्तर: * कलंक: इसका तात्पर्य चंद्रमा के काले धब्बे से है। जैसे चंद्रमा कलंकित होने पर भी संसार को उजाला देता है, वैसे ही कवि के शारीरिक दोष उनके ज्ञान के आगे गौण हैं।
- काँच: इसका तात्पर्य उस कच्चे सोने से है जिसे अभी तपाया नहीं गया है।
- कंचन: इसका तात्पर्य शुद्ध और तपाये हुए सोने से है। कवि का आशय है कि जैसे बिना तपे सोना 'कंचन' नहीं बनता, वैसे ही बिना संघर्ष और दोष के महानता नहीं आती।
3. पहले कड़बक में व्यंजित जायसी के आत्मविश्वास का परिचय अपने शब्दों में दें।
उत्तर: जायसी शारीरिक रूप से कुरूप थे और उनकी एक आँख और कान में दोष था, लेकिन उनका आत्मविश्वास अटूट था। वे खुद को चंद्रमा और शुक्र तारे के समान तेजस्वी मानते हैं। वे कहते हैं कि रूप से अधिक गुण महत्वपूर्ण होते हैं। उन्हें विश्वास है कि उनकी काव्य-दृष्टि ने पूरे संसार को समझ लिया है और उनकी आंतरिक निर्मलता के कारण ही दुनिया उन्हें सम्मान की दृष्टि से देखती है।
4. कवि ने किस रूप में स्वयं को याद रखे जाने की इच्छा व्यक्त की है? उनकी इस इच्छा का मर्म बताएँ।
उत्तर: कवि ने अपनी 'कीर्ति' (यश) के रूप में स्वयं को याद रखे जाने की इच्छा व्यक्त की है। उनका मानना है कि मनुष्य मर जाता है, लेकिन उसकी रचनाएँ और उसके अच्छे कर्म (सुगंध की तरह) हमेशा जीवित रहते हैं। वे चाहते हैं कि जो भी उनकी 'पद्मावत' जैसी प्रेम-कहानी को पढ़े, वह उन्हें दो शब्दों में याद रखे।
5. भाव स्पष्ट करें: "जौ लहि अंबहि डाभ न होई। तौ लहि सुगंध बसाइ न सोई।।"
उत्तर: इसका भाव यह है कि जब तक आम में नकीली मंजरी (डाभ) नहीं निकलती, तब तक उसमें वह मीठी सुगंध पैदा नहीं होती। इसी प्रकार, व्यक्ति में जब तक कोई कमी या संघर्ष नहीं आता, तब तक उसके व्यक्तित्व में निखार और गुणों की सुगंध नहीं आती।
6. 'रकत कै लेई' का क्या अर्थ है?
उत्तर: 'रकत कै लेई' का अर्थ है— अपने रक्त की गोंद (लेई)। कवि का तात्पर्य है कि उन्होंने इस काव्य की रचना बहुत कठिन परिश्रम और हृदय की गहराई से की है। उन्होंने अपनी भावनाओं को शब्दों में पिरोने के लिए अत्यधिक मानसिक और शारीरिक श्रम किया है।
7. 'मुहमद यहि कबि जोरि सुनावा'—यहाँ कवि ने 'जोरि' शब्द का प्रयोग किस अर्थ में किया है?
उत्तर: यहाँ 'जोरि' शब्द का अर्थ है— रचना करना या जोड़कर लिखना। कवि ने विभिन्न ऐतिहासिक तथ्यों और काल्पनिक प्रसंगों को प्रेम के धागे में पिरोकर इस महाकाव्य की रचना की है।
8. दूसरे कड़बक का भाव-सौंदर्य स्पष्ट करें।
उत्तर: दूसरे कड़बक में कवि ने नश्वरता और अमरता के बीच के संबंध को दिखाया है। वे कहते हैं कि रत्नसेन, पद्मावती और अलाउद्दीन जैसे ऐतिहासिक पात्र अब नहीं रहे, लेकिन उनकी कहानी आज भी मौजूद है। इसका भाव यह है कि भौतिक शरीर नश्वर है, परंतु यश (कीर्ति) हमेशा अमर रहती है।
9. व्याख्या करें: "धनि सो पुरूख जस कीरति जासू। फूल मरै पै मरै न बासू।।"
उत्तर: कवि कहते हैं कि वह मनुष्य धन्य है जिसकी कीर्ति (यश) इस संसार में शेष रह जाती है। जैसे फूल मुरझाकर नष्ट हो जाता है, पर उसकी महक (बासू) वातावरण में बनी रहती है, वैसे ही मनुष्य के मरने के बाद भी उसका यश सुगंध की तरह दुनिया में फैला रहता है।
भाषा की बात
1. निम्नलिखित शब्दों के तीन-तीन पर्यायवाची लिखें:
- नैन: चक्षु, लोचन, आँख।
- आम: रसाल, आम्र, सौरभ।
- चंद्रमा: चाँद, शशि, राकेश।
- रक्त: लहू, खून, रुधिर।
- राजा: नृप, भूपति, नरेश।
- फूल: पुष्प, सुमन, कुसुम।
2. पहले कड़बक में कवि ने अपने लिए किन उपमानों की चर्चा की है? उत्तर: कवि ने स्वयं के लिए निम्नलिखित उपमानों का प्रयोग किया है:
- चंद्रमा (कलंक के बावजूद प्रकाश देने वाला)
- शुक्र तारा (नक्षत्रों में सबसे तेजस्वी)
- दर्पण (निर्मल और स्वच्छ स्वभाव का प्रतीक)
3. निम्नलिखित शब्दों के मानक (शुद्ध) रूप लिखें:
- तिरसूल: त्रिशूल
- नखत: नक्षत्र
- नैन: नयन
- दरपन: दर्पण
- निरमल: निर्मल
- पानि: पानी
- पेम: प्रेम
- रकत: रक्त
- कीरति: कीर्ति
- पुरुख: पुरुष


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