नाभादास: एक संक्षिप्त परिचय
नाभादास सगुणोपासक रामभक्त परंपरा के एक प्रमुख संत और भावुक कवि थे। वे गोस्वामी तुलसीदास के समकालीन माने जाते हैं। उनकी भक्ति में केवल मर्यादा के स्थान पर माधुर्यभाव का विशेष पुट था।
मुख्य बिंदु:
- जन्म एवं निवास: इनका जन्म अनुमानतः 1570 ई. में दक्षिण भारत में हुआ था। बचपन में माता-पिता के बिछोह के बाद ये जयपुर (राजस्थान) आ गए और इनका स्थायी निवास वृंदावन रहा।
- शिक्षा एवं गुरु: इनकी शिक्षा गुरु की देख-रेख में स्वाध्याय और सत्संग के माध्यम से हुई। इनके दीक्षागुरु स्वामी अग्रदास (अग्रअली) थे, जो स्वामी रामानंद की शिष्य परंपरा से थे।
- प्रमुख कृतियाँ: इनकी सबसे प्रसिद्ध और कालजयी रचना 'भक्तमाल' है, जिसका रचनाकाल 1585-1596 निर्धारित किया गया है। इसके अतिरिक्त इन्होंने ब्रजभाषा गद्य और दोहा-चौपाई शैली में 'अष्टयाम' की भी रचना की।
- साहित्यिक एवं वैचारिक विशेषता: अपनी प्रसिद्ध कृति 'भक्तमाल' में उन्होंने धर्म, संप्रदाय, जाति या लिंग के भेदभाव को महत्त्व न देते हुए अपने पूर्ववर्ती और समकालीन वैष्णव भक्तों के जीवन-चरित्र का सुंदर वर्णन किया है। वे पक्षपात, दुराग्रह और कट्टरता से पूर्णतः मुक्त एक विवेकसंपन्न सच्चे वैष्णव थे।
- पृष्ठभूमि: अधिकतर विद्वानों के अनुसार इनकी पारिवारिक-सामाजिक पृष्ठभूमि दलित वर्ग की थी।
कबीरदास जी पर छप्पय की व्याख्या
- भगति विमुख जे धर्म सो सब अधर्म करि गाए । व्याख्या: कबीरदास जी ने स्पष्ट कहा कि जो भी धर्म या कर्म भक्ति से रहित है, वह वास्तव में 'अधर्म' के समान है। उन्होंने भक्तिहीन धार्मिक कर्मकांडों को व्यर्थ माना।
- योग यज्ञ व्रत दान भजन बिनु तुच्छ दिखाए ॥ व्याख्या: उन्होंने योग, यज्ञ, व्रत और दान जैसे कार्यों को तब तक 'तुच्छ' (छोटा या बेकार) बताया, जब तक उनमें ईश्वर के प्रति सच्चा प्रेम और भजन शामिल न हो।
- हिंदू तुरक प्रमान रमैनी सबदी साखी । व्याख्या: कबीर ने अपनी रचनाओं (रमैनी, शब्द और साखी) के माध्यम से हिंदू और मुसलमान—दोनों के लिए समान प्रमाण प्रस्तुत किए और दोनों की कुरीतियों पर प्रहार किया।
- पक्षपात नहिं बचन सबहिके हितकी भाषी ॥ व्याख्या: उनकी वाणी में कभी कोई पक्षपात नहीं था। उन्होंने जो कुछ भी कहा, वह किसी विशेष धर्म के लिए नहीं, बल्कि पूरी मानवता के हित और कल्याण के लिए कहा।
- आरूढ़ दशा है जगत पै, मुख देखी नाहीं भनी । व्याख्या: कबीर सत्य की उस ऊँची अवस्था पर आरूढ़ (विराजमान) थे, जहाँ उन्होंने कभी 'मुख देखी' (चापलूसी या लोक-लाज) बात नहीं की। उन्होंने हमेशा बिना डरे कड़वा सच बोला।
- कबीर कानि राखी नहीं, वर्णाश्रम षट दर्शनी । व्याख्या: कबीर ने वर्णाश्रम व्यवस्था (जाति-पाति) और छहों दर्शनों की कभी कोई 'कानि' (मर्यादा या परवाह) नहीं की। उन्होंने मानवता को इन सबसे ऊपर रखा।
सूरदास जी पर छप्पय की व्याख्या
- उक्ति चौज अनुप्रास वर्ण अस्थिति अतिभारी । व्याख्या: सूरदास की कविता में कथनों का चमत्कार (चौज), अनुप्रास अलंकार और वर्णों की सुंदर सजावट बहुत ही प्रभावी और सुदृढ़ है।
- बचन प्रीति निर्वही अर्थ अद्भुत तुकधारी ॥ व्याख्या: उनकी वाणी में प्रेम का अद्भुत निर्वाह है। उनकी कविता के अर्थ गहरे हैं और उनकी तुकबंदी (Rhyming) अत्यंत चमत्कारिक है।
- प्रतिबिंबित दिवि दृष्टि हृदय हरि लीला भासी । व्याख्या: यद्यपि सूरदास नेत्रहीन थे, लेकिन उन्हें ईश्वर की कृपा से 'दिव्य दृष्टि' प्राप्त थी, जिससे उनके हृदय में भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं का सीधा साक्षात्कार होता था।
- जन्म कर्म गुन रूप सबहि रसना परकासी ॥ व्याख्या: श्री कृष्ण के जन्म, उनके कर्म (लीलाओं), गुणों और उनके रूप का सूरदास ने अपनी 'रसना' (जीभ/वाणी) से इतना सजीव वर्णन किया कि वह सबके सामने प्रकाशित हो गया।
- विमल बुद्धि हो तासुकी, जो यह गुन श्रवननि धरै । व्याख्या: जो व्यक्ति सूरदास द्वारा वर्णित भगवान के इन गुणों को अपने कानों से सुनता है, उसकी बुद्धि निर्मल (स्वच्छ) और पवित्र हो जाती है।
- सूर कवित सुनि कौन कवि, जो नहिं शिरचालन करै । व्याख्या: सूरदास की कविता को सुनकर ऐसा कौन सा कवि होगा, जो प्रशंसा में अपना सिर न हिलाने लगे (यानी उनकी श्रेष्ठता को स्वीकार न करे)।

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